मुझे ज़िंदगी ने दिया कुछ नहीं
मगर मुझ को उस का गिला कुछ नहीं
ख़यालों के ख़ंजर बहुत तेज़ हैं
वही ख़ुश है जो सोचता कुछ नहीं
बहुत ख़ूब-रू था मिरा हम-सुख़न
उसे देखने में सुना कुछ नहीं
बस इक पल की दीवार है दरमियाँ
अदम से मिरा फ़ासला कुछ नहीं
वो गुल नज़्र-ए-ख़ाक-ए-ख़िज़ाँ हो गए
ख़बर तुझ को बाद-ए-सबा कुछ नहीं
ये हंगामा-ए-आलम-ए-आब-ओ-गिल
ब-जुज़ एक शोर-ए-फ़ना कुछ नहीं
वही हिज्र है और वही वस्ल है
मिरा तजरबा भी नया कुछ नहीं
तवालत मिरी गुफ़्तुगू में जो थी
मिरे पास कहने को था कुछ नहीं
'फ़रासत' वही बे-हिसी है यहाँ
तिरे गिर्ये से तो हुआ कुछ नहीं
ग़ज़ल
मुझे ज़िंदगी ने दिया कुछ नहीं
फ़रासत रिज़वी

