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मुझे ख़ुशी है मिरी उस से रस्म-ओ-राह नहीं | शाही शायरी
mujhe KHushi hai meri us se rasm-o-rah nahin

ग़ज़ल

मुझे ख़ुशी है मिरी उस से रस्म-ओ-राह नहीं

जलील ’आली’

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मुझे ख़ुशी है मिरी उस से रस्म-ओ-राह नहीं
वो शख़्स दिल से किसी का भी ख़ैर-ख़्वाह नहीं

सभी ख़मोश हैं आपस की दुश्मनी में यहाँ
किसी की बे-गुनही का कोई गवाह नहीं

वो मंसबों की हवा में है किसी तरह समझे
ग़ुलाम शहर में कोई भी कज-कुलाह नहीं

हम अपने शौक़ दियों की सलामती चाहें
किसी के अंजुम-ओ-महताब पर निगाह नहीं

अना के मोल न तख़्त-ए-शही भी ले आएँ
वगर्ना किस को तमन्ना-ए-नाम-ओ-जाह नहीं