मुझे ख़ुशी है मिरी उस से रस्म-ओ-राह नहीं
वो शख़्स दिल से किसी का भी ख़ैर-ख़्वाह नहीं
सभी ख़मोश हैं आपस की दुश्मनी में यहाँ
किसी की बे-गुनही का कोई गवाह नहीं
वो मंसबों की हवा में है किसी तरह समझे
ग़ुलाम शहर में कोई भी कज-कुलाह नहीं
हम अपने शौक़ दियों की सलामती चाहें
किसी के अंजुम-ओ-महताब पर निगाह नहीं
अना के मोल न तख़्त-ए-शही भी ले आएँ
वगर्ना किस को तमन्ना-ए-नाम-ओ-जाह नहीं
ग़ज़ल
मुझे ख़ुशी है मिरी उस से रस्म-ओ-राह नहीं
जलील ’आली’

