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मुझे जल्वों की उस के तमीज़ हो क्या मेरे होश-ओ-हवास बचा ही नहीं | शाही शायरी
mujhe jalwon ki uske tamiz ho kya mere hosh-o-hawas bacha hi nahin

ग़ज़ल

मुझे जल्वों की उस के तमीज़ हो क्या मेरे होश-ओ-हवास बचा ही नहीं

बेदम शाह वारसी

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मुझे जल्वों की उस के तमीज़ हो क्या मेरे होश-ओ-हवास बचा ही नहीं
है ये बे-ख़बरी कि ख़बर ही नहीं वो नक़ाब उठा कि उठा ही नहीं

मिरे हाल पे छोड़ तबीब मुझे कि अज़ाब है मिरी ज़ीस्त मुझे
मेरा मरना ही मेरे लिए है शिफ़ा मेरे दर्द की कोई दवा ही नहीं

उसे ढूँडते ढूँडते खो गए हमें हुआ किया और क्या हो गए हम
हमें पहरों तक अपनी ख़बर ही नहीं हमें कोसों तक अपना पता ही नहीं

मिरा हाल ख़राब सुना तो कहा कि वो सामने मेरे न आए कभी
मुझे रोते जो देखा तो हँस के कहा कि ये शेवा-ए-अहल-ए-वफ़ा ही नहीं

जहाँ कोई सितम ईजाद किया मुझे कह के फ़लक ने ये याद किया
कि बस एक दिल-ए-'बेदम' के सिवा कोई क़ाबिल-ए-मश्क़-ए-जफ़ा ही नहीं