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मुझे भी अपना शरीक-ए-सफ़र शुमार करो | शाही शायरी
mujhe bhi apna sharik-e-safar shumar karo

ग़ज़ल

मुझे भी अपना शरीक-ए-सफ़र शुमार करो

मुसव्विर सब्ज़वारी

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मुझे भी अपना शरीक-ए-सफ़र शुमार करो
सहर के बुझते दियो मेरा इंतिज़ार करो

हमारा ज़ौक़-ए-नुमू क्या शिकस्ता शीशे हैं
हम आइनों को अता पर्दा-ए-ग़ुबार करो

हमारे अश्कों की मेराज अपने दामन तक
तुम अपनी पाकी-ए-दामाँ का ए'तिबार करो

छुपाए जाओ यूँही दाग़ दाग़ सीनों को
ख़याल-ए-बेकसी-ए-इस्मत-ए-बहार करो

न दो दुआ-ए-ख़िरद मुझ को ख़ैर-अनदेशो
जो कर सको तो मिरी वहशतों से प्यार करो

फिर आज इश्क़ 'मुसव्विर' हुआ है ख़ाक-बसर
फिर एहतिमाम-ए-उरूज-ए-सलीब-ओ-दार करो