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मुझे ऐ हम-नफ़स अंदेशा-ए-बर्क़-ओ-ख़िज़ाँ क्यूँ हो | शाही शायरी
mujhe ai ham-nafas andesha-e-barq-o-KHizan kyun ho

ग़ज़ल

मुझे ऐ हम-नफ़स अंदेशा-ए-बर्क़-ओ-ख़िज़ाँ क्यूँ हो

मंज़ूर हुसैन शोर

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मुझे ऐ हम-नफ़स अंदेशा-ए-बर्क़-ओ-ख़िज़ाँ क्यूँ हो
मिरी पर्वाज़ महदूद-ए-फ़ज़ा-ए-गुलसिताँ क्यूँ हो

जुनूँ की वुसअ'तों पर तंग है अर्सा दो-आलम का
जो सज्दा हो तो फिर सज्दा ब-क़ैद-ए-आस्ताँ क्यूँ हो

मिरे काम आ गई आख़िर मिरी काशाना-बर-दोशी
शरार-ओ-बर्क़ की ज़द पर भी मेरा आशियाँ क्यूँ हो

ग़म-ए-दिल भी जो रुस्वा-ए-मज़ाक़-ए-आम हो जाए
तो फिर इन दास्तानों में हमारी दास्ताँ क्यूँ हो

प्यालों की खनक से भी जहाँ दिल टूट जाते हैं
वहाँ छाया हुआ हर बज़्म पर ख़्वाब-ए-गिराँ क्यूँ हो

न मैं जाँ-दादा-ए-साक़ी न मैं वारफ़्ता-ए-मुतरिब
अगर महफ़िल से उठ जाऊँ तो महफ़िल बद-गुमाँ क्यूँ हो

मैं जिस आलम में हूँ अपनी जगह ऐ 'शोर' तन्हा हूँ
जुदा हो जिस की मंज़िल वो रहीन-ए-कारवाँ क्यूँ हो