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मुझ पे हैं सैकड़ों इल्ज़ाम मिरे साथ न चल | शाही शायरी
mujh pe hain saikDon ilzam mere sath na chal

ग़ज़ल

मुझ पे हैं सैकड़ों इल्ज़ाम मिरे साथ न चल

शकील आज़मी

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मुझ पे हैं सैकड़ों इल्ज़ाम मिरे साथ न चल
तू भी हो जाएगा बदनाम मिरे साथ न चल

तू नई सुबह के सूरज की है उजली सी किरन
मैं हूँ इक धूल भरी शाम मिरे साथ न चल

अपनी ख़ुशियाँ मिरे आलाम से मंसूब न कर
मुझ से मत माँग मिरा नाम मिरे साथ न चल

तू भी खो जाएगी टपके हुए आँसू की तरह
देख ऐ गर्दिश-ए-अय्याम मिरे साथ न चल

मेरी दीवार को तू कितना सँभालेगा 'शकील'
टूटता रहता हूँ हर गाम मिरे साथ न चल