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मुझ को तलब तो नई दुनिया की है | शाही शायरी
mujhko talab to nai duniya ki hai

ग़ज़ल

मुझ को तलब तो नई दुनिया की है

मुहिब आरफ़ी

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मुझ को तलब तो नई दुनिया की है
राहबरी नक़्श-ए-कफ़-ए-पा की है

बादिया-पैमाई-ए-वहशत से तंग
बे-उफ़क़ी वुसअत-ए-सहरा की है

है वही मौजूद जो है दीदनी
राय यही दीदा-ए-बीना की है

घूर रही है जिसे प्यासी नज़र
शक्ल वो मय की नहीं मीना की है

दिल-कशी-ए-पेच-ओ-ख़म-ए-पैरहन
देन ख़म-ओ-पेच-ए-सरापा की है

ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ के तलव्वुन में भी
ख़ूबी-ए-तमकीं रुख़-ए-ज़ेबा की है

मुझ से वो है मुझ से ज़ियादा क़रीब
ख़्वाहिश-ए-क़ुर्ब उस से ज़ियादा की है

यूँ तो किनायों का भी आदी है दार
दिल की हवस इस के अलावा की है

नक़्श में नुक़्तों के सिवा कुछ नहीं
शक्ल-गरी शौक़-ए-तमाशा की है

सब्त 'मुहिब' उस लब-ए-जाँ-बख़्श पर
तिश्ना-लबी मेरी तमन्ना की है