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मुझ को मसनद पे क़लमदाँ बख़्शा | शाही शायरी
mujhko masnad pe qalamdan baKHsha

ग़ज़ल

मुझ को मसनद पे क़लमदाँ बख़्शा

मीर कल्लू अर्श

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मुझ को मसनद पे क़लमदाँ बख़्शा
शेर-ए-क़ालीं को नियस्ताँ बख़्शा

पीर-ए-कनआँ' को दिया दाग़-ए-फ़िराक़
एक ज़न को मह-ए-कनआँ' बख़्शा

मरज़-ए-इश्क़ में मौत आती है
तू ने हर दर्द को दरमाँ बख़्शा

क़ाबिल-ए-दीद है हुस्न-ए-हिकमत
हूर को रौज़ा-ए-रिज़वाँ बख़्शा

क़तरा भी वुसअ'त-ए-रहमत से है बहर
चश्म को नूह का तूफ़ाँ बख़्शा

दिल-ए-नालाँ को दिए दाग़-ए-फ़िराक़
एक बुलबुल को गुलिस्ताँ बख़्शा

दिल-ए-बे-रहम दिया ज़ालिम को
जिस तरह तीर को पैकाँ बख़्शा

गुल को पुर-ज़र जो गरेबाँ बख़्शा
ख़ार को दश्त का दामाँ बख़्शा

रहम आया जो गुनहगारों पर
गुनह-ए-गब्र-ओ-मुसलमाँ बख़्शा

आ गया कुछ जो करीमी का ख़याल
हूर को मुल्क-ए-सुलैमाँ बख़्शा

तेरी तदबीर है ऐन-ए-तक़दीर
मौत को आलम-ए-इम्काँ बख़्शा

सुर्ख़-रू अहल-ए-करम को रक्खा
बहर को पंजा-ए-मर्जां बख़्शा

लब की जा बोसा-ए-रुख़्सार दिया
एवज़-ए-ला'ल बदख़्शाँ बख़्शा

मुसहफ़-ए-रुख़ का जो देखा कोई शेर
रूह-ए-'हाफ़िज़' को भी क़ुरआँ बख़्शा

उस से हूँ तालिब-ए-ईमाँ ऐ 'अर्श'
जिस ने काफ़िर को भी ईमाँ बख़्शा