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मुझ को दुनिया की तमन्ना है न दीं का लालच | शाही शायरी
mujhko duniya ki tamanna hai na din ka lalach

ग़ज़ल

मुझ को दुनिया की तमन्ना है न दीं का लालच

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

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मुझ को दुनिया की तमन्ना है न दीं का लालच
हाए लालच है तो इक माह-जबीं का लालच

इश्क़-बाज़ी पे सुना मुझ को मलामत न करो
हैफ़ है जिस को न हो तुम से हसीं का लालच

हालत-ए-क़ल्ब सर-ए-बज़्म बताऊँ क्यूँकर
पर्दा-ए-दिल में है इक पर्दा-नशीं का लालच

जब यहीं तैश में गुज़रे तो वहाँ क्या उम्मीद
न रहा इस लिए हम को तो कहीं का लालच

बोरिया तख़्त-ए-सुलैमाँ से कहीं बेहतर है
हम ग़रीबों को नहीं ताज-ओ-नगीं का लालच

न मैं दुनिया का तलबगार न उक़्बा की हवस
आसमानों की तमन्ना न ज़मीं का लालच

दिल भी दो जान भी दो ज़र भी दो उस को 'परवीं'
बढ़ गया सब से मिरे माह-जबीं का लालच