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मोहब्बतों का चमन पाएमाल हम ने किया | शाही शायरी
mohabbaton ka chaman paemal humne kiya

ग़ज़ल

मोहब्बतों का चमन पाएमाल हम ने किया

फ़रासत रिज़वी

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मोहब्बतों का चमन पाएमाल हम ने किया
ख़ुद अपने आप का जीना मुहाल हम ने किया

जो लज़्ज़तें हैं दुखों में मसर्रतों में कहाँ
मिला उरूज तो उस को ज़वाल हम ने किया

न कार-ए-दिल के थे लाएक़ न कार-ए-दुनिया के
जो कुछ किया तो ग़म-ए-माह-ओ-साल हम ने किया

हज़ार दर्द के मौसम गुज़र गए लेकिन
कभी दराज़ न दस्त-ए-सवाल हम ने किया

ये रम्ज़-ए-इश्क़ ये नाज़ुक किनाए हम ने सिखाए
निगाह-ए-नाज़ तुझे बे-मिसाल हम ने किया

दिए तराश लिए यास के अँधेरों से
ग़म-ए-फ़िराक़ को ख़्वाब-ए-विसाल हम ने किया

सुख़न से रंग गया ज़िंदगी से ख़्वाब गए
ये ज़ख़्म हिज्र का क्यूँ इंदिमाल हम ने किया

हुई है आज तबीअ'त सुख़न पे फिर माइल
सो मौज-ए-दर्द को दिल में बहाल हम ने किया