मोहब्बत से भी कार-ए-ज़िंदगी आसाँ नहीं होता
बहल जाता है दिल ग़म का मगर दरमाँ नहीं होता
कली दिल की खिले अफ़्सोस ये सामाँ नहीं होता
घटाएँ घिर के आती हैं मगर बाराँ नहीं होता
मोहब्बत के एवज़ में ओ मोहब्बत ढूँडने वाले
ये दुनिया है यहाँ ऐसा अरे नादाँ नहीं होता
दिल-ए-नाकाम इक तू ही नहीं है सिर्फ़ मुश्किल में
उसे इंकार करना भी तो कुछ आसाँ नहीं होता
हँसी में ग़म छुपा लेना ये सब कहने की बातें हैं
जो ग़म दर-अस्ल ग़म होता है वो पिन्हाँ नहीं होता
ज़माने ने ये तख़्ती किश्त-ए-अरमाँ पर लगा दी है
गुल इस क्यारी में आता है मगर ख़ंदाँ नहीं होता
कहीं क्या तुम से हम अपने दिल-ए-मजबूर का आलम
समझ में वज्ह-ए-ग़म आती है और दरमाँ नहीं होता
मआल-ए-इख़्तिलाफ़-ए-बाहमी अफ़्सोस क्या कहिए
हर इक क़तरे में शोरिश है मगर तूफ़ाँ नहीं होता
दयार-ए-इश्क़ है ये ज़र्फ़-ए-दिल की जाँच होती है
यहाँ पोशाक से अंदाज़ा-ए-इंसाँ नहीं होता
ग़ुरूर-ए-हुस्न तेरी बे-नियाज़ी शान-ए-इस्तिग़ना
जभी तक है कि जब तक इश्क़ बे-पायाँ नहीं होता
सदा-ए-बाज़गश्त आती है अय्याम-ए-गुज़िश्ता की
ये दिल वीरान हो जाने पे भी वीराँ नहीं होता
मोहब्बत तो बजा-ए-ख़ुद इक ईमाँ है अरे 'मुल्ला'
मोहब्बत करने वाले का कोई ईमाँ नहीं होता
ग़ज़ल
मोहब्बत से भी कार-ए-ज़िंदगी आसाँ नहीं होता
आनंद नारायण मुल्ला

