EN اردو
मोहब्बत में ठनी अक्सर यहाँ तक | शाही शायरी
mohabbat mein Thani aksar yahan tak

ग़ज़ल

मोहब्बत में ठनी अक्सर यहाँ तक

मुबारक अज़ीमाबादी

;

मोहब्बत में ठनी अक्सर यहाँ तक
कि पहुँचे मारके तीर ओ कमाँ तक

चले नावक खिंची ज़ालिम कमाँ तक
कहाँ तक इम्तिहाँ आख़िर कहाँ तक

चले जाते हैं आवाज़-ए-जरस पर
पहुँच जाएँगे बिछड़े कारवाँ तक

हवा-ए-शौक़ के झोंके सलामत
रहोगे तुम पस-ए-पर्दा कहाँ तक

न वो अय्यार मुझ से पूछता है
न दिल की बात आती है ज़बाँ तक

उसी सर को सर-ए-शोरीदा कहिए
जो पहुँचे उस के संग-ए-आस्ताँ तक

नियाज़ ओ नाज़ के चर्चे रहेंगे
हमारी और तुम्हारी दास्ताँ तक

'मुबारक' को कोई दिन और सुन लो
बयाँ का लुत्फ़ है उस ख़ुश-बयाँ तक