मोहब्बत में न जाने क्यूँ हमें फ़ुर्सत ज़ियादा है
हमारा काम थोड़ा है मगर मोहलत ज़ियादा है
हमें इस आलम-ए-हिज्राँ में भी रुक रुक के चलना है
उन्हें जाने दिया जाए जिन्हें उजलत ज़ियादा है
ये दिल बाहर धड़कता है ये आँख अंदर को खुलती है
हम ऐसे मरहले में हैं जहाँ ज़हमत ज़ियादा है
सो हम फ़रियादियों की एक अपनी सफ़ अलग से हो
हमारा मसअला ये है हमें हैरत ज़ियादा है
समझ पाए नहीं देखे बग़ैर उस का नज़र आना
मशक़्क़त कम से कम की थी मगर उजरत ज़ियादा है
तमाशा-गाह चारों सम्त से पुर-शोर है या'नी
कहीं जल्वत ज़ियादा है कहीं ख़ल्वत ज़ियादा है
तुझे हल्क़ा-ब-हल्क़ा खींचते फिरते हैं दुनिया में
सो ऐ ज़ंजीर-ए-पा यूँ भी तिरी शोहरत ज़ियादा है
ये सारी आमद-ओ-रफ़्त एक जैसी तो नहीं 'शाहीन'
कि दुनिया में सफ़र कम कम है और हिजरत ज़ियादा है
ग़ज़ल
मोहब्बत में न जाने क्यूँ हमें फ़ुर्सत ज़ियादा है
शाहीन अब्बास

