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मोहब्बत कर के शर्मिंदा नहीं हूँ | शाही शायरी
mohabbat kar ke sharminda nahin hun

ग़ज़ल

मोहब्बत कर के शर्मिंदा नहीं हूँ

असग़र मेहदी होश

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मोहब्बत कर के शर्मिंदा नहीं हूँ
मैं इस दुनिया का बाशिंदा नहीं हूँ

हिसाब-ए-दिल-बराँ मुझ से न माँगो
मैं इक शाइर हूँ कारिंदा नहीं हूँ

मैं इक आज़ाद-ओ-ख़ुद-रौशन सितारा
किसी सूरज से ताबिंदा नहीं हूँ

तिलिस्म-ए-ग़म से पत्थर हो गया हूँ
मैं ज़िंदा हूँ मगर ज़िंदा नहीं हूँ

ये मेरा अहद मुझ में जी रहा है
मैं बस अपना नुमाइंदा नहीं हूँ