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मिज़ाज-ए-नग़्मा-ओ-शे'र-ओ-शराब पैदा कर | शाही शायरी
mizaj-e-naghma-o-sher-o-sharab paida kar

ग़ज़ल

मिज़ाज-ए-नग़्मा-ओ-शे'र-ओ-शराब पैदा कर

रईस नियाज़ी

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मिज़ाज-ए-नग़्मा-ओ-शे'र-ओ-शराब पैदा कर
हयात-ए-इश्क़ में कुछ आब-ओ-ताब पैदा कर

नज़र को ख़ीरगी-ए-शौक़ बे-पनाह मिले
हर एक ज़र्रे से वो आफ़्ताब पैदा कर

शिकस्त-ए-ख़्वाब के बा-वस्फ़ बंद हैं आँखें
फिर एक बार तमाशा-ए-ख़्वाब पैदा कर

ये बे-नियाज़ी-ए-तज़ईन-ए-आइना कब तक
कभी कभी तो ख़ुद अपना जवाब पैदा कर

हर एक ज़र्रा है मामूरा-ए-जमाल-ए-हबीब
दिल-ए-हज़ीं निगह-ए-कामयाब पैदा कर

दिल-ओ-निगाह को धोके भी रास आए हैं
वुफ़ूर-ए-तिश्ना-लबी में सराब पैदा कर

न कर शिकायत-ए-दौराँ न बन हरीफ़-ए-ज़माँ
मुसीबतों का कोई सद्द-ए-बाब पैदा कर

पहुँच बुलंद-ए-मक़ामात-ए-शे'र-ओ-नग़्मा तक
अदब में एक दिल-आवेज़ बाब पैदा कर

ग़रज़ तो ये है तिरा मरकज़-ए-निगाह रहूँ
सुकून-ए-दिल न सही इज़्तिराब पैदा कर

'रईस' तुझ को तो मरने की भी नहीं फ़ुर्सत
कहा था किस ने कि ऐसे अज़ाब पैदा कर