मिरी बंदगी तुझे दे सकेगी बजाए मआनी ओ लफ़्ज़ क्या
है मिरे शुऊर की झोलियों में सिवाए मआनी-ओ-लफ़्ज़ क्या
जो नज़र का बोझ न सह सकीं वो ज़बाँ का बोझ सहेंगी क्या
सुबुक-ओ-लतीफ़ इशारतों पे जफ़ा-ए-मआनी-ओ-लफ़्ज़ क्या
मुझे डर है ऐ सुख़न-आफ़रीं ये लिबास उन पर गिराँ न हो
जो हक़ीक़तें न पहन सकीं वो क़बा-ए-मआनी-ओ-लफ़्ज़ क्या
न वो शम्स में न क़मर में है वो हिजाब-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र में है
जो हिजाब-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र उठा तो ग़िज़ा-ए-मआनी-ओ-लफ़्ज़ क्या
मिरी रूह अगरचे है गुर्सिना मिरा शौक़ अगरचे है जाँ-ब-लब
मगर ऐ 'जमील'-ए-ग़ज़ल-सरा ये रीदा-ए-मआनी-ओ-लफ़्ज़ क्या
ग़ज़ल
मिरी बंदगी तुझे दे सकेगी बजाए मआनी ओ लफ़्ज़ क्या
जमील मज़हरी

