मिरे फ़रज़ाना बनने का बहुत इम्कान बाक़ी है
अभी जैब-ओ-गरेबाँ की मुझे पहचान बाक़ी है
मिरे सीने में तेरे तीर का पैकान बाक़ी है
ब-अल्फ़ाज़-ए-दिगर रूदाद का उन्वान बाक़ी है
बका-ए-जावेदाँ बख़्शी है जिस को तेरी नज़रों ने
मिरे दिल में अभी ऐसा भी इक अरमान बाक़ी है
सरिश्त-ए-हुस्न का तब्दील होना ग़ैर-मुमकिन है
सरिश्त-ए-इश्क़ में जिस वक़्त तक अरमान बाक़ी है
'अज़ीज़-वारसी' उस की हक़ीक़त किस तरह समझे
अभी तो ज़ात का अपनी ही कुछ इरफ़ान बाक़ी है
ग़ज़ल
मिरे फ़रज़ाना बनने का बहुत इम्कान बाक़ी है
अज़ीज़ वारसी

