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मिरे चेहरे से ग़म आँखों से हैरानी न जाएगी | शाही शायरी
mere chehre se gham aaankhon se hairani na jaegi

ग़ज़ल

मिरे चेहरे से ग़म आँखों से हैरानी न जाएगी

सिद्दीक़ मुजीबी

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मिरे चेहरे से ग़म आँखों से हैरानी न जाएगी
यही सूरत रहेगी और पहचानी न जाएगी

तुम्हारा झूट मेरे सच का क़ातिल है मगर दुनिया
तुम्हारी मान जाएगी मिरी मानी न जाएगी

अना सर चढ़ गई है इक बगूले की तरह ऐसी
कि सर जाएगा इक दिन ख़ू-ए-उर्यानी न जाएगी

तुम्हारे पास ज़ंजीरें हमारे दस्त ओ पा ज़ख़्मी
लहू ज़िंदा है जब तक अपनी मन-मानी न जाएगी

मिरा दुख भी नविश्ता है मिरी तक़दीर का शायद
जो मैं गुल हूँ तो मेरी चाक-दामानी न जाएगी

सबा आवारा फिरती है नवाह-ए-जाँ में बरसों से
ये वो ख़ित्ता है जिस से उस की वीरानी न जाएगी

क़लम दिल में डुबो कर भी 'मुजीबी' कुछ न हाथ आया
ये वो एहसास है जिस की पशेमानी न जाएगी