मिरा दिल भी मुअ'म्मा हो गया है
भरी-महफ़िल में तन्हा हो गया है
बड़ा आसान जीना हो गया है
गराँ फिर लम्हा लम्हा हो गया है
जो रोता था मिरे ज़ख़्मों पे यारो
वो आईना भी अंधा हो गया है
नज़र आता नहीं इंसान कोई
हमारा शहर सहरा हो गया है
कोई भी शय क़रीने से नहीं है
अजब दिल का घरौंदा हो गया है
मिरा घर मुंतज़िर है रौशनी का
ज़माने में सवेरा हो गया है
कहाँ है ग़ैर जानिब-दार कोई
अदू सारा ज़माना हो गया है
शब-ए-ग़म मुख़्तसर होने लगी है
मरीज़-ए-हिज्र चंगा हो गया है
फ़लक पर आज-कल ही ऐसे-वैसे
ग़ुरूब अपना सितारा हो गया है
जिसे मैं क़त्ल कर आया था 'सैफ़ी'
वही अब मुझ में ज़िंदा हो गया है
ग़ज़ल
मिरा दिल भी मुअ'म्मा हो गया है
मुनीर सैफ़ी

