दस्त-ओ-पा मारे वक़्त-ए-बिस्मिल तक
हाथ पहुँचा न पा-ए-क़ातिल तक
का'बा पहुँचा तो क्या हुआ ऐ शैख़
सई कर टुक पहुँच किसी दिल तक
दरपय महमिल उस के जैसे जरस
मैं भी नालाँ हूँ साथ मंज़िल तक
बुझ गए हम चराग़ से बाहर
कहियो ऐ बाद-ए-शम्अ' महफ़िल तक
न गया 'मीर' अपनी कश्ती से
एक भी तख़्ता पारा साहिल तक
ग़ज़ल
दस्त-ओ-पा मारे वक़्त-ए-बिस्मिल तक
मीर तक़ी मीर

