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हर जज़्र-ओ-मद से दस्त-ओ-बग़ल उठते हैं ख़रोश | शाही शायरी
har jazr-o-mad se dast-o-baghal uThte hain KHarosh

ग़ज़ल

हर जज़्र-ओ-मद से दस्त-ओ-बग़ल उठते हैं ख़रोश

मीर तक़ी मीर

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हर जज़्र-ओ-मद से दस्त-ओ-बग़ल उठते हैं ख़रोश
किस का है राज़ बहर में यारब कि ये हैं जोश

अबरू-ए-कज है मौज कोई चश्म है हबाब
मोती किसी की बात है सीपी किसी का गोश

उन मुग़्बचों के कूचे ही से मैं क्या सलाम
क्या मुझ को तौफ़-ए-काबा से में रिंद-ए-दर्द-नोश

हैरत से होवे परतव-ए-मह नूर आईना
तू चाँदनी में निकले अगर हो सफ़ेद-पोश

कल हम ने सैर-ए-बाग़ में दिल हाथ से दिया
इक सादा गुल-फ़रोश का आ कर सबद ब-दोश

जाता रहा निगाह से जूँ मौसम-ए-बहार
आज उस बग़ैर दाग़-ए-जिगर हैं सियाह-पोश

शब इस दिल-गिरफ़्ता को वा कर ब-ज़ोर-ए-मय
बैठे थे शीरा-ख़ाने में हम कितने हर्ज़ा-कोश

आई सदा कि याद करो दूर रफ़्ता को
इबरत भी है ज़रूर टक ऐ जम्अ' तेज़ होश

जमशेद जिस ने वज़्अ किया जाम क्या हुआ
वे नसीहतें कहाँ गईं कीधर वे नाव-नोश

जुज़ लाला उस के जाम से पाते नहीं निशाँ
है कोकनार उस की जगह अब सुबू ब-दोश

झूमे है बेद जा-ए-जवानान मय-गुसार
बाला-ए-ख़म है ख़िश्त सर पैर मय-फ़रोश

'मीर' इस ग़ज़ल को ख़ूब कहा था ज़मीर ने
पर ऐ ज़बाँ-दराज़ बहुत हो चुकी ख़मोश