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दिल में भरा ज़-बस-कि ख़याल-ए-शराब था | शाही शायरी
dil mein bhara za-bas-ki KHayal-e-sharab tha

ग़ज़ल

दिल में भरा ज़-बस-कि ख़याल-ए-शराब था

मीर तक़ी मीर

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दिल में भरा ज़-बस-कि ख़याल-ए-शराब था
मानिंद आइने के मिरे घर में आब था

मौजें करे है बहर-ए-जहाँ में अभी तो तू
जानेगा बा'द-ए-मर्ग कि आलम हबाब था

उगते थे दस्त-ए-बुलबुल-ओ-दामान गुल बहम
सहन-ए-चमन नमूना-ए-यौम-उल-हिसाब था

टुक देख आँखें खोल के उस दम की हसरतें
जिस दम ये सूझेगी कि ये आलम भी ख़्वाब था

दिल जो न था तो रात ज़-ख़ुद-रफ़तगी में 'मीर'
गह इंतिज़ार ओ गाह मुझे इज़्तिराब था