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हम भी फिरते हैं यक हशम ले कर | शाही शायरी
hum bhi phirte hain yak hasham le kar

ग़ज़ल

हम भी फिरते हैं यक हशम ले कर

मीर तक़ी मीर

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हम भी फिरते हैं यक हशम ले कर
दस्ता-ए-दाग़-ओ-फ़ौज-ए-ग़म ले कर

दस्त-कश नाला पेश-रौ गिर्या
आह चलती है याँ इल्म ले कर

मर्ग इक माँदगी का वक़्फ़ा है
या'नी आगे चलेंगे दम ले कर

उस के ऊपर कि दिल से था नज़दीक
ग़म-ए-दूरी चले हैं हम ले कर

तेरी वज़-ए-सितम से ऐ बे-दर्द
एक आलम गया अलम ले कर

बारहा सैद-गह से उस की गए
दाग़-ए-यास आहु-ए-हरम ले कर

ज़ोफ़ याँ तक खिंचा कि सूरत-गर
रह गए हाथ में क़लम ले कर

दिल पे कब इक्तिफ़ा करे है इश्क़
जाएगा जान भी ये ग़म ले कर

शौक़ अगर है यही तो ऐ क़ासिद
हम भी आते हैं अब रक़म ले कर

'मीर'-साहिब ही चूके ए बद-अहद
वर्ना देना था दिल क़सम ले कर