ऐ गुल-ए-नौ-दमीदा के मानिंद
है तू किस आफ़रीदा के मानिंद
हम उम्मीद-ए-वफ़ा पे तेरी हुए
गुंचा-ए-दैर चीदा के मानिंद
ख़ाक को मेरी सैर कर के फिरा
वो ग़ज़ाल-ए-रमीदा के मानिंद
सर उठाते ही हो गए पामाल
सब्ज़ा-ए-नौ-दमीदा के मानिंद
न कटे रात हिज्र की जो न हो
नाला तेग़-ए-कशीदा के मानिंद
हम गिरफ़्तार-ए-हाल हैं अपने
ताइर-ए-पर-बुरीदा के मानिंद
दिल तड़पता है अश्क-ए-ख़ूनीं में
सैद-ए-दर-ख़ूँ तपीदा के मानिंद
तुझ से यूसुफ़ को क्यूँके निस्बत दें
कब शुनीदा हो दीदा के मानिंद
'मीर'-साहिब भी उस के हाँ थे लेक
बंदा-ए-ज़र ख़रीदा के मानिंद
ग़ज़ल
ऐ गुल-ए-नौ-दमीदा के मानिंद
मीर तक़ी मीर

