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गिला नहीं है हमें अपनी जाँ-गुदाज़ी का | शाही शायरी
gila nahin hai hamein apni jaan-gudazi ka

ग़ज़ल

गिला नहीं है हमें अपनी जाँ-गुदाज़ी का

मीर तक़ी मीर

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गिला नहीं है हमें अपनी जाँ-गुदाज़ी का
जिगर पे ज़ख़्म है उस की ज़बाँ-दराज़ी का

समंद-ए-नाज़ ने उस के जहाँ किया पामाल
वही है अब भी उसे शौक़ तर्क ताज़ी का

सितम हैं क़हर हैं लौंडे शराब-ख़ाने के
उतार लेते हैं अमामा हर नमाज़ी का

उलट-पलट मिरी आह-ए-सहर की क्या है कम
अगर ख़याल तुम्हें होवे नेज़ा-बाज़ी का

बताओ हम से कोई आन तुम से क्या बिगड़ी
नहीं है तुम को सलीक़ा ज़माना-साज़ी का

ख़ुदा को काम तो सौंपे हैं मैं ने सब लेकिन
रहे है ख़ौफ़ मुझे वाँ की बे-नियाज़ी का

चलो हो राह-ए-मुआफ़िक़ कहे मुख़ालिफ़ के
तरीक़ छोड़ दिया तुम ने दिल-नवाज़ी का

कसो की बात ने आगे मिरे न पाया रंग
दिलों में नक़्श है मेरी सुख़न-तराज़ी का

बसान-ए-ख़ाक हो पामाल राह-ए-ख़ल्क़ ऐ 'मीर'
रखे है दिल में अगर क़स्द सरफ़राज़ी का