जो ये दिल है तो क्या सर-अंजाम होगा
ता-ख़ाक भी ख़ाक आराम होगा
मिरा-जी तो आँखों में आया ये सुनते
कि दीदार भी एक दिन आम होगा
न होगा वो देखा जिसे कब्क तू ने
वो इक बाग़ का सर्व-अंदाम होगा
न निकला कर इतना भी बे-पर्दा घर से
बहुत उस में ज़ालिम तो बदनाम होगा
हज़ारों की याँ लग गईं छत से आँखें
तू ऐ माह किस शब-ए-लब-ओ-बाम होगा
वो कुछ जानता होगा ज़ुल्फ़ों में फँसना
जो कोई असीर ता-दाम होगा
जिगर चाकी नाकामी दुनिया है आख़िर
नहीं आए जो 'मीर' कुछ काम होगा
ग़ज़ल
जो ये दिल है तो क्या सर-अंजाम होगा
मीर तक़ी मीर

