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दिल-ओ-दिमाग़ है अब किस को ज़िंदगानी का | शाही शायरी
dil-o-dimagh hai ab kis ko zindagani ka

ग़ज़ल

दिल-ओ-दिमाग़ है अब किस को ज़िंदगानी का

मीर तक़ी मीर

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दिल-ओ-दिमाग़ है अब किस को ज़िंदगानी का
जो कोई दम है तो अफ़्सोस है जवानी का

अगरचे उम्र के दस दिन ये लब रहे ख़ामोश
सुख़न रहेगा सदा मेरी कम-ज़बानी का

सुबुक है आवे जो मिंदील रख नमाज़ को शैख़
रहा है कौन सा अब वक़्त सरगिरानी का

हज़ार जान से क़ुर्बान बे-परी के हैं
ख़याल भी कभू गुज़रा न पर-फ़िशानी का

फिरे है खींचे ही तलवार मुझ पे हर-दम तो
कि सैद हूँ मैं तिरी दुश्मनी जानी का

नुमूद कर के वहीं बहर-ए-ग़म में बैठ गया
कहे तो 'मीर' भी इक बुलबुला था पानी का