दिल-ओ-दिमाग़ है अब किस को ज़िंदगानी का
जो कोई दम है तो अफ़्सोस है जवानी का
अगरचे उम्र के दस दिन ये लब रहे ख़ामोश
सुख़न रहेगा सदा मेरी कम-ज़बानी का
सुबुक है आवे जो मिंदील रख नमाज़ को शैख़
रहा है कौन सा अब वक़्त सरगिरानी का
हज़ार जान से क़ुर्बान बे-परी के हैं
ख़याल भी कभू गुज़रा न पर-फ़िशानी का
फिरे है खींचे ही तलवार मुझ पे हर-दम तो
कि सैद हूँ मैं तिरी दुश्मनी जानी का
नुमूद कर के वहीं बहर-ए-ग़म में बैठ गया
कहे तो 'मीर' भी इक बुलबुला था पानी का
ग़ज़ल
दिल-ओ-दिमाग़ है अब किस को ज़िंदगानी का
मीर तक़ी मीर

