कब तलक जी रुके ख़फ़ा होवे
आह करिए कि टक हवा होवे
जी ठहर जाए या हवा होवे
देखिए होते होते क्या होवे
कर नमक सूद सीना-ए-मजरूह
जी में गर है कि कुछ मज़ा होवे
काहिश-ए-दिल की कीजिए तदबीर
जान में कुछ भी जो रहा होवे
चुप का बाइ'स है बे-तमन्नाई
कहिए कुछ भी तो मुद्दआ' होवे
बेकली मारे डालती है नसीम
देखिए अब के साल क्या होवे
मर गए हम तो मर गए तो जी
दिल-गिरफ़्ता तिरी बला होवे
इश्क़ किया है दुरुस्त ऐ नासेह
जाने वो जिस का दिल-लगा होवे
फिर न शैताँ सुजूद-ए-आदम से
शायद उस पर्दे में ख़ुदा होवे
न सुना रात हम ने इक नाला
ग़ालिबन 'मीर' मर रहा होवे
ग़ज़ल
कब तलक जी रुके ख़फ़ा होवे
मीर तक़ी मीर

