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कब तलक जी रुके ख़फ़ा होवे | शाही शायरी
kab talak ji ruke KHafa howe

ग़ज़ल

कब तलक जी रुके ख़फ़ा होवे

मीर तक़ी मीर

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कब तलक जी रुके ख़फ़ा होवे
आह करिए कि टक हवा होवे

जी ठहर जाए या हवा होवे
देखिए होते होते क्या होवे

कर नमक सूद सीना-ए-मजरूह
जी में गर है कि कुछ मज़ा होवे

काहिश-ए-दिल की कीजिए तदबीर
जान में कुछ भी जो रहा होवे

चुप का बाइ'स है बे-तमन्नाई
कहिए कुछ भी तो मुद्दआ' होवे

बेकली मारे डालती है नसीम
देखिए अब के साल क्या होवे

मर गए हम तो मर गए तो जी
दिल-गिरफ़्ता तिरी बला होवे

इश्क़ किया है दुरुस्त ऐ नासेह
जाने वो जिस का दिल-लगा होवे

फिर न शैताँ सुजूद-ए-आदम से
शायद उस पर्दे में ख़ुदा होवे

न सुना रात हम ने इक नाला
ग़ालिबन 'मीर' मर रहा होवे