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हम हुए तुम हुए कि 'मीर' हुए | शाही शायरी
hum hue tum hue ki mir hue

ग़ज़ल

हम हुए तुम हुए कि 'मीर' हुए

मीर तक़ी मीर

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हम हुए तुम हुए कि 'मीर' हुए
उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए

जिन की ख़ातिर की उस्तुख़्वाँ-शिकनी
सो हम उन के निशान-ए-तीर हुए

नहीं आते कसो की आँखों में
हो के आशिक़ बहुत हक़ीर हुए

आगे ये बे-अदाइयाँ कब थीं
इन दिनों तुम बहुत शरीर हुए

अपने रोते ही रोते सहरा के
गोशे गोशे में आब-गीर हुए

ऐसी हस्ती अदम में दाख़िल है
नय जवाँ हम न तिफ़्ल-ए-शीर हुए

एक दम थी नुमूद बूद अपनी
या सफ़ेदी की या अख़ीर हुए

या'नी मानिंद-ए-सुब्ह दुनिया में
हम जो पैदा हुए सौ पीर हुए

मत मिल अहल-ए-दुवल के लड़कों से
'मीर'-जी उन से मिल फ़क़ीर हुए