हम हुए तुम हुए कि 'मीर' हुए
उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए
जिन की ख़ातिर की उस्तुख़्वाँ-शिकनी
सो हम उन के निशान-ए-तीर हुए
नहीं आते कसो की आँखों में
हो के आशिक़ बहुत हक़ीर हुए
आगे ये बे-अदाइयाँ कब थीं
इन दिनों तुम बहुत शरीर हुए
अपने रोते ही रोते सहरा के
गोशे गोशे में आब-गीर हुए
ऐसी हस्ती अदम में दाख़िल है
नय जवाँ हम न तिफ़्ल-ए-शीर हुए
एक दम थी नुमूद बूद अपनी
या सफ़ेदी की या अख़ीर हुए
या'नी मानिंद-ए-सुब्ह दुनिया में
हम जो पैदा हुए सौ पीर हुए
मत मिल अहल-ए-दुवल के लड़कों से
'मीर'-जी उन से मिल फ़क़ीर हुए
ग़ज़ल
हम हुए तुम हुए कि 'मीर' हुए
मीर तक़ी मीर

