दुज़्दीदा निगह करना फिर आँख मिलाना भी
इस लौटते दामन को पास आ के उठाना भी
पामाली-ए-आशिक़ को मंज़ूर रखे जाना
फिर चाल कढब चलना ठोकर न लगाना भी
बुर्क़ा को उठा देना पर आधे ही चेहरे से
क्या मुँह को छुपाना भी कुछ झमकी दिखाना भी
देख आँखें मिरी नीची इक मारना पत्थर भी
ज़ाहिर में सताना भी पर्दे में जताना भी
सोहबत है ये वैसी ही ऐ जान की आसाइश
साथ आन के सोना भी फिर मुँह को छुपाना भी
ग़ज़ल
दुज़्दीदा निगह करना फिर आँख मिलाना भी
मीर तक़ी मीर

