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इश्क़ में नय ख़ौफ़-ओ-ख़तर चाहिए | शाही शायरी
ishq mein nai KHauf-o-KHatar chahiye

ग़ज़ल

इश्क़ में नय ख़ौफ़-ओ-ख़तर चाहिए

मीर तक़ी मीर

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इश्क़ में नय ख़ौफ़-ओ-ख़तर चाहिए
जान के देने को जिगर चाहिए

क़ाबिल-ए-आग़ोश सितम दीदगाँ
अश्क सा पाकीज़ा गुहर चाहिए

हाल ये पहुँचा है कि अब ज़ोफ़ से
उठते पलक एक पहर चाहिए

कम है शनासा-ए-ज़र-ए-दाग़-ए-दिल
उस के परखने को नज़र चाहिए

सैंकड़ों मरते हैं सदा फिर भी याँ
वाक़िआ' इक शाम-ओ-सहर चाहिए

इश्क़ के आसार हैं ऐ बुल-हवस
दाग़ ब-दिल-ए-दस्त बसर चाहिए

शर्त सलीक़ा है हर इक अमर में
ऐब भी करने को हुनर चाहिए

जैसे जरस पारा गुलो क्या करूँ
नाला-ओ-अफ़्ग़ाँ में असर चाहिए

ख़ौफ़ क़यामत का यही है कि 'मीर'
हम को जिया बार-ए-दिगर चाहिए