EN اردو
कब से नज़र लगी थी दरवाज़ा-ए-हरम से | शाही शायरी
kab se nazar lagi thi darwaza-e-haram se

ग़ज़ल

कब से नज़र लगी थी दरवाज़ा-ए-हरम से

मीर तक़ी मीर

;

कब से नज़र लगी थी दरवाज़ा-ए-हरम से
पर्दा उठा तो लड़ियाँ आँखें हमारी हम से

सूरत गर अजल का क्या हाथ था कहे तो
खींची वो तेग़-ए-अबरू फ़ौलाद के क़लम से

सोज़िश गई न दिल की रोने से रोज़-ओ-शब के
जलता हूँ और दरिया बहते हैं चश्म-ए-नम से

ताअ'त का वक़्त गुज़रा मस्ती में आब रज़ की
अब चश्म-दाश्त उस के याँ है फ़क़त करम से

कुढि़ए न रोइए तो औक़ात क्यूँके गुज़रे
रहता है मश्ग़ला सा बार-ए-ग़म-ओ-अलम से

मशहूर है समाजत मेरी कि तेग़ बरसी
पर मैं न सर उठाया हरगिज़ तिरे क़दम से

बात एहतियात से कर ज़ाएअ' न कर नफ़स को
बालीदगी दिल है मानिंद-ए-शीशा दम से

क्या क्या तअब उठाए क्या क्या अज़ाब देखे
तब दिल हुआ है उतना ख़ूगर तिरे सितम से

हस्ती में हम ने आ कर आसूदगी न देखी
खुलतीं न काश आँखें ख़्वाब ख़ुश अदम से

पामाल कर के हम को पछताओगे बहुत तुम
कमयाब हैं जहाँ में सर देने वाले हम से

दिल दो हो 'मीर' साहब उस बद-मआ'श को तुम
ख़ातिर तो जम्अ' कर लो टक क़ौल से क़सम से