आज-कल बे-क़रार हैं हम भी
बैठ जा चलने हार हैं हम भी
आन में कुछ हैं आन में कुछ हैं
तोह्फ़ा-ए-रोज़गार हैं हम भी
मना गिर्या न कर तो ऐ नासेह
इस में बे-इख़्तियार हैं हम भी
दरपय जान है क़रावुल मर्ग
कसो के तो शिकार हैं हम भी
नाले करियो समझ के ऐ बुलबुल
बाग़ में यक कनार हैं हम भी
मुद्दई' को शराब हम को ज़हर
आक़िबत दोस्त-दार हैं हम भी
मुज़्तरिब गिर्या नाक है ये गुल
बर्क़ अब्र-ए-बहार हैं हम भी
गर ज़-ख़ुद रफ़्ता हैं तिरे नज़दीक
अपने तो यादगार हैं हम भी
'मीर' नाम इक जवाँ सुना होगा
उसी आशिक़ के यार हैं हम भी
ग़ज़ल
आज-कल बे-क़रार हैं हम भी
मीर तक़ी मीर

