गर्म हैं शोर से तुझ हुस्न के बाज़ार कई
रश्क से जलते हैं यूसुफ़ के ख़रीदार कई
कब तलक दाग़ दिखावेगी असीरी मुझ को
मर गए साथ के मेरे तो गिरफ़्तार कई
वे ही चालाकियाँ हाथों की हैं जो अव्वल थीं
अब गरेबाँ में मिरे रह गए हैं तार कई
ख़ौफ़-ए-तन्हाई नहीं कर तू जहाँ से तो सफ़र
हर जगह राह-ए-अदम में मिलेंगे यार कई
इज़तिराब-ओ-क़िल्क़-ओ-ज़ोफ़ में किस तौर जियूँ
जान वाहिद है मिरी और हैं आज़ार कई
क्यूँ न हूँ ख़स्ता भला मैं कि सितम के तेरे
तीर हैं पार कई वार हैं सोफ़ार कई
अपने कूचे में निकलयो तो सँभाले दामन
यादगार-ए-मिज़ा-ए-'मीर' हैं वाँ ख़ार कई
ग़ज़ल
गर्म हैं शोर से तुझ हुस्न के बाज़ार कई
मीर तक़ी मीर

