हो गई शहर शहर रुस्वाई
ऐ मिरी मौत तो भली आई
यक बयाबाँ ब-रंग-ए-सौत-ए-जरस
मुझ पे है बे-कसी-ओ-तन्हाई
न खिंचे तुझ से एक जा नक़्क़ाश
उस की तस्वीर वो है हरजाई
सर रखूँ उस के पाँव पर लेकिन
दस्त-ए-क़ुदरत ये में कहाँ पाई
'मीर' जब से गया है दिल तब से
मैं तो कुछ हो गया हूँ सौदाई
ग़ज़ल
हो गई शहर शहर रुस्वाई
मीर तक़ी मीर

