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गर्मी से मैं तो आतिश-ए-ग़म की पिघल गया | शाही शायरी
garmi se main to aatish-e-gham ki pighal gaya

ग़ज़ल

गर्मी से मैं तो आतिश-ए-ग़म की पिघल गया

मीर तक़ी मीर

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गर्मी से मैं तो आतिश-ए-ग़म की पिघल गया
रातों को रोते रोते ही जों शम-ए-गुल गया

हम ख़स्ता-दिल हैं तुझ से भी नाज़ुक-मिज़ाज-तर
तेवरी चढ़ाई तू ने कि याँ जी निकल गया

गर्मी-ए-इश्क़ माने नश्व-ओ-नुमा हुई
मैं वो निहाल था कि उगा और जल गया

मस्ती में छोड़ दैर को का'बे चला था मैं
लग़्ज़िश बड़ी हुई थी व-लेकिन सँभल गया

साक़ी नशे में तुझ से लुंढा शीशा-ए-शराब
चल अब कि दुख़्त-ए-ताक का जोबन तो ढल गया

हर ज़र्रा ख़ाक तेरी गली की है बे-क़रार
याँ कौन सा सितम-ज़दा माटी में रुल गया

उर्यां तनी की शोख़ी से दीवानगी में 'मीर'
मजनूँ के दश्त-ए-ख़ार का दामाँ भी चल गया