गर्मी से मैं तो आतिश-ए-ग़म की पिघल गया
रातों को रोते रोते ही जों शम-ए-गुल गया
हम ख़स्ता-दिल हैं तुझ से भी नाज़ुक-मिज़ाज-तर
तेवरी चढ़ाई तू ने कि याँ जी निकल गया
गर्मी-ए-इश्क़ माने नश्व-ओ-नुमा हुई
मैं वो निहाल था कि उगा और जल गया
मस्ती में छोड़ दैर को का'बे चला था मैं
लग़्ज़िश बड़ी हुई थी व-लेकिन सँभल गया
साक़ी नशे में तुझ से लुंढा शीशा-ए-शराब
चल अब कि दुख़्त-ए-ताक का जोबन तो ढल गया
हर ज़र्रा ख़ाक तेरी गली की है बे-क़रार
याँ कौन सा सितम-ज़दा माटी में रुल गया
उर्यां तनी की शोख़ी से दीवानगी में 'मीर'
मजनूँ के दश्त-ए-ख़ार का दामाँ भी चल गया
ग़ज़ल
गर्मी से मैं तो आतिश-ए-ग़म की पिघल गया
मीर तक़ी मीर

