गुज़र जान से और डर कुछ नहीं
रह-ए-इश्क़ में फिर ख़तर कुछ नहीं
है अब काम दिल जिस पे मौक़ूफ़ तो
वो नाला कि जिस में असर कुछ नहीं
हुआ माइल उस सर्व का दिल मिरा
ब-जुज़ जौर जिस से समर कुछ नहीं
न कर अपने महवों का हरगिज़ सुराग़
गए गुज़रे बस अब ख़बर कुछ नहीं
तिरी हो चुकी ख़ुश्क मिज़्गाँ की सब
लहू अब जिगर में मगर कुछ नहीं
हया से नहीं पुश्त-ए-पा पर वो चश्म
मिरा हाल मद्द-ए-नज़र कुछ नहीं
करूँ क्यूँके इंकार इश्क़ आह में
ये रोना भला क्या है गर कुछ नहीं
कमर उस की रश्क रग-ए-जाँ है 'मीर'
ग़रज़ इस से बारीक-तर कुछ नहीं
ग़ज़ल
गुज़र जान से और डर कुछ नहीं
मीर तक़ी मीर

