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बे-रवी व ज़ुल्फ़-ए-यार है रोने से काम याँ | शाही शायरी
be-rawi wa zulf-e-yar hai rone se kaam yan

ग़ज़ल

बे-रवी व ज़ुल्फ़-ए-यार है रोने से काम याँ

मीर तक़ी मीर

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बे-रवी व ज़ुल्फ़-ए-यार है रोने से काम याँ
दामन है मुँह पे अब्र-ए-नमत सुब्ह-ओ-शाम याँ

आवाज़ा ही जहाँ में हमारा सुना करो
अन्क़ा के तौर ज़ीस्त है अपनी ब-नाम याँ

वस्फ़-ए-दहन से उस के न आगे क़लम चले
या'नी क्या है ख़ामे ने ख़त्म कलाम याँ

ग़ालिब ये है कि मौसम-ए-ख़त वाँ क़रीब है
आने लगा है मुत्तसिल उस का पयाम याँ

मत खा फ़रेब-ए-इज्ज़ अज़ीज़ान-ए-हाल का
पिन्हाँ किए हैं ख़ाक में यारों ने दाम याँ

कोई हुआ न दस्त-बसर शहर-ए-हुस्न में
शायद नहीं है रस्म-ए-जवाब सलाम याँ

नाकाम रहने ही का तुम्हें ग़म है आज 'मीर'
बहुतों के काम हो गए हैं कुल तमाम याँ