EN اردو
मिलता है क़ैद-ए-ग़म में भी लुत्फ़-ए-फ़ज़ा-ए-बाग़ | शाही शायरी
milta hai qaid-e-gham mein bhi lutf-e-faza-e-bagh

ग़ज़ल

मिलता है क़ैद-ए-ग़म में भी लुत्फ़-ए-फ़ज़ा-ए-बाग़

अरशद अली ख़ान क़लक़

;

मिलता है क़ैद-ए-ग़म में भी लुत्फ़-ए-फ़ज़ा-ए-बाग़
चाक-ए-क़फ़स से आती है फ़रफ़र हवा-ए-बाग़

रोके ज़बाँ न बुलबुल-ए-बुस्ताँ सरा-ए-बाग़
दोहराए फिर मिरे से कहो माजरा-ए-बाग़

सुनते हैं अब की आई है किस धूम से बहार
क्या जी फड़क रहा है क़फ़स में बराए बाग़

किन चहचहों में अपनी बसर होती थी मुदाम
ऐ हम-सफ़ीर क्या हो बयाँ माजरा-ए-बाग़

गुज़रे नसीम इधर से तो पूछेंगे हम असीर
हम को भी याद करते हैं नग़्मा-सरा-ए-बाग़

ऐ हम-सफ़ीर अब तो चले क़ैद हो के हम
तक़दीर देखिए हमें फिर कब दिखाए बाग़

मुझ मस्त का चमन में शनासा कोई नहीं
इक दुख़्त-ए-रज़ क़दीम से है आश्ना-ए-बाग़

पाते हैं सर्व-ए-गुल में तिरी शक्ल क़द्द-ओ-रुख़
फ़ुर्क़त में जी कहीं नहीं लगता सिवाए बाग़

उस दिन से अपने बुलबुल-ए-दिल को है इश्क़-ए-गुल
गुलज़ार-ए-दहर में हुई जैसे बिना-ए-बाग़

मिलता नहीं है नख़्ल-ए-तमन्ना से याँ समर
फिर कोई किस उमीद पे इस जा लगाए बाग़

नर्गिस की है वो आँख न गुल का वो रंग है
चलती है अब की साल मुख़ालिफ़ हवा-ए-बाग़

अब चहचहे हैं वो न नवा-संजियाँ हैं वो
शायद गुज़र गया 'क़लक़'-ए-ख़ुश-नवा-ए-बाग़