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मिला-दिला सही इक ख़ुश्क हार बाक़ी है | शाही शायरी
mila-dila sahi ek KHushk haar baqi hai

ग़ज़ल

मिला-दिला सही इक ख़ुश्क हार बाक़ी है

सिराज लखनवी

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मिला-दिला सही इक ख़ुश्क हार बाक़ी है
अभी बहार-ए-शिकस्त-ए-बहार बाक़ी है

नज़र सँवार चुकी कितने आइना-ख़ाने
उसी तरह हवस-ए-दीद-ए-यार बाक़ी है

बिछौना काँटों का है फिर भी आई जाती है नींद
अभी तसव्वुर-ए-ज़ानू-ए-यार बाक़ी है

शिकस्त-ए-अहद के क्यूँ हों न सिलसिले क़ाएम
इक आसरा पस-ए-हर-ए'तिबार बाक़ी है

क़फ़स में फ़ुर्सत-ए-फ़िक्र-ए-चमन-तराज़ कहाँ
यही बहुत है ख़याल-ए-बहार बाक़ी है

वो आँखें भी खुलीं बदली जो वक़्त ने करवट
इधर नहीं अब इधर इंतिज़ार बाक़ी है

ये रूह-ओ-तन की जुदाई का मर्सिया कब तक
वही दो-रंगी-ए-लैल-ओ-नहार बाक़ी है

चमन तो नीम-निगाही ने कर दिया तक़्सीम
ख़ुदा-ए-वक़्त कोई और वार बाक़ी है

'सिराज' अब भी ये अक़्लीम-ए-रंग-ओ-बू है बहुत
लुटी-लुटाई हुई जो बहार बाक़ी है