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मिल बैठने ये दे है फ़लक एक दम कहाँ | शाही शायरी
mil baiThne ye de hai falak ek dam kahan

ग़ज़ल

मिल बैठने ये दे है फ़लक एक दम कहाँ

शाह नसीर

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मिल बैठने ये दे है फ़लक एक दम कहाँ
क्या जाने तुम कहाँ हो कोई दम को हम कहाँ

कूचे से तेरे उठ के भला जाएँ हम कहाँ
जुज़ नक़्श-ए-पा है रहबर-ए-मुल्क-ए-अदम कहाँ

दामन-कशाँ फिरे है मिरी ख़ाक से हनूज़
रखता है आह वो सर-ए-मरक़द क़दम कहाँ

उस के सफ़-ए-मिज़ा से लड़ावे निशान-ए-आह
ऐ फ़ौज-ए-अश्क जाए है ले कर अलम कहाँ

मेरा ही लख़्त-ए-दिल है कि हम-राह-ए-अश्क है
वर्ना रहे है आब से आतिश बहम कहाँ

सब से जुदा तिरे ख़त-ए-रैहाँ की शान है
उस ख़त को लिख सके है ज़मुर्रद रक़म कहाँ

मुँह देखूँ जो करे यद-ए-क़ुदरत से हम-सरी
ऐसी सफ़ाई हाथ की और ये क़लम कहाँ

क्यूँ-कर न सक़्फ़-ए-चर्ख़-ए-कुहन थम रहे 'नसीर'
मेरे सुतून-ए-आह छुट इस में है थम कहाँ