EN اردو
मिल बैठने के सारे क़रीनों की ख़ैर हो | शाही शायरी
mil baiThne ke sare qarinon ki KHair ho

ग़ज़ल

मिल बैठने के सारे क़रीनों की ख़ैर हो

शबनम शकील

;

मिल बैठने के सारे क़रीनों की ख़ैर हो
इस कारवाँ-सरा के मकीनों की ख़ैर हो

ठहराव पानियों में है कितना अजीब सा
दरिया के ख़ुश-ख़िराम सफ़ीनों की ख़ैर हो

हर ख़्वाब के सफ़र में मिरे पाँव के तले
आ कर खिसकने वाली ज़मीनों की ख़ैर हो

कर एक लम्हा सुख का मिरे रोज़-ओ-शब को दान
तेरे तमाम साल महीनों की ख़ैर हो

दम से उन्ही के अपने दर-ओ-बाम हैं बुलंद
मेरे वतन के ख़ाक-नशीनों की ख़ैर हो