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मीठे चश्मों से ख़ुनुक छाँव से दूर | शाही शायरी
miThe chashmon se KHunuk chhanw se dur

ग़ज़ल

मीठे चश्मों से ख़ुनुक छाँव से दूर

शकेब जलाली

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मीठे चश्मों से ख़ुनुक छाँव से दूर
ज़ख़्म खुलते हैं तिरे गाँव से दूर

संग-ए-मंज़िल ने लहू उगला है
दूर हम बादिया-पैमाओं से दूर

कितनी शमएँ हैं असीर-ए-फ़ानूस
कितने यूसुफ़ हैं ज़ुलेख़ाओं से दूर

किश्त-ए-उम्मीद सुलगती ही रही
अब्र बरसा भी तो सहराओं से दूर

जौर-ए-हालात भला हो तेरा
चैन मिलता है शनासाओं से दूर

जन्नत-ए-फ़िक्र बुलाती है चलो
दैर-ओ-का'बा से कलीसाओं से दूर

रक़्स-ए-आशुफ़्ता-सराँ देखेंगे
दूर इन अंजुमन-आराओं से दूर

जुस्तुजू है दुर-ए-यकता की 'शकेब'
सीपियाँ चुनते हैं दरियाओं से दूर