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'मीर'-ओ-'ग़ालिब' बने 'यगाना' बने | शाही शायरी
mir-o-ghaalib bane yagana bane

ग़ज़ल

'मीर'-ओ-'ग़ालिब' बने 'यगाना' बने

हबीब जालिब

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'मीर'-ओ-'ग़ालिब' बने 'यगाना' बने
आदमी ऐ ख़ुदा ख़ुदा न बने

मौत की दस्तरस में कब से हैं
ज़िंदगी का कोई बहाना बने

अपना शायद यही था जुर्म ऐ दोस्त
बा-वफ़ा बन के बे-वफ़ा न बने

हम पे इक ए'तिराज़ ये भी है
बे-नवा हो के बे-नवा न बने

ये भी अपना क़ुसूर क्या कम है
किसी क़ातिल के हम-नवा न बने

क्या गिला संग-दिल ज़माने का
आश्ना ही जब आश्ना न बने

छोड़ कर उस गली को ऐ 'जालिब'
इक हक़ीक़त से हम फ़साना बने