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मेरी बर्बादी को चश्म-ए-मो'तबर से देखिए | शाही शायरी
meri barbaadi ko chashm-e-moatabar se dekhiye

ग़ज़ल

मेरी बर्बादी को चश्म-ए-मो'तबर से देखिए

शकील बदायुनी

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मेरी बर्बादी को चश्म-ए-मो'तबर से देखिए
'मीर' का दीवान 'ग़ालिब' की नज़र से देखिए

मुस्कुरा कर यूँ न अपनी रहगुज़र से देखिए
जिस तरफ़ मेरी नज़र चाहे उधर से देखिए

हैं दलील-ए-कम-निगाही इख़्तिलाफ़ात-ए-नज़र
ज़िंदगी का एक ही रुख़ है जिधर से देखिए

भरते रहते हैं जहन्नम ज़िंदगी के चारासाज़
दुश्मन-ए-जाँ हैं अगर गहरी नज़र से देखिए

मेरे ग़म-ख़ाने के चारों सम्त हैं दौलत-कदे
ज़िंदगी की भीक मिलती है किधर से देखिए

फ़ितरतन हर आदमी है तालिब-ए-अम्न-ओ-अमाँ
दुश्मनों को भी मोहब्बत की नज़र से देखिए

भेज दी तस्वीर अपनी उन को ये लिख कर 'शकील'
आप की मर्ज़ी है चाहे जिस नज़र से देखिए