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मेरे लिए हज़ार करे एहतिमाम हिर्स | शाही शायरी
mere liye hazar kare ehtimam hirs

ग़ज़ल

मेरे लिए हज़ार करे एहतिमाम हिर्स

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

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मेरे लिए हज़ार करे एहतिमाम हिर्स
मैं वो हों मुझ पे डाल सकेगी न दाम हिर्स

है कुछ न कुछ हर आदमी को ला-कलाम हिर्स
लेकिन न इस क़दर कि बना ले ग़ुलाम हिर्स

ऐ ज़ुल्फ़ फैल फैल के रुख़्सार को न ढाँक
कर नीम-रोज़ की न शह-ए-मुल्क-ए-शाम हिर्स

वाइ'ज़ शराब-ओ-हूर की उल्फ़त में ग़र्क़ है
है सर से पाँव तक ये सितम-गर तमाम हिर्स

दिल छीन आशिक़ों के मगर होशियार रह
ऐसा न हो कि दिल को बना ले ग़ुलाम हिर्स

नाक़िस रहेंगे सारे तलव्वुन से कारोबार
करने न देगी तुझ को यहाँ कोई काम हिर्स

क़ब्ज़ा उठाएगी न दिल-ए-रोज़गार से
जब तक न ज़िंदगी का करे इख़्तिताम हिर्स

मुद्दत से इश्तियाक़ है बोस-ओ-कनार का
गर हुक्म हो शुरूअ' करे अपना काम हिर्स

'परवीं' लगी हुई है ख़ुदा से मुझे उमीद
दिल को मिरे बनाए न अपना ग़ुलाम हिर्स