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मेरे लहजे में मिरे ज़ख़्म की गहराई है | शाही शायरी
mere lahje mein mere zaKHm ki gahrai hai

ग़ज़ल

मेरे लहजे में मिरे ज़ख़्म की गहराई है

जाज़िब क़ुरैशी

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मेरे लहजे में मिरे ज़ख़्म की गहराई है
रौशनी रात के आँगन में उतर आई है

फिर मुझे प्यार के साहिल पे ठहरना होगा
फिर तिरे दिल के धड़कने की सदा आई है

दर-ओ-दीवार पे कुछ अक्स उतर आते हैं
मेरे घर में अजब अंदाज़ की तन्हाई है

सिर्फ़ फूलों में नहीं हैं तेरे चेहरे के रंग
माह-ए-नौ भी तिरी ठहरी हुई अंगड़ाई है

वो सबा सब जिसे आवारा कहा करते हैं
तेरे आँचल की महक मेरे लिए लाई है

क़हक़हा-बार रहो शोला-ए-ग़म से न डरो
वर्ना इस शहर-ए-हुनर में बड़ी रुस्वाई है