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मेरे जुनून-ए-शौक़ को इतनी सी काएनात बस | शाही शायरी
mere junun-e-shauq ko itni si kaenat bas

ग़ज़ल

मेरे जुनून-ए-शौक़ को इतनी सी काएनात बस

अफ़ीफ़ सिराज

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मेरे जुनून-ए-शौक़ को इतनी सी काएनात बस
कार-ए-दराज़ के लिए छोटी सी ये हयात बस

कैसी हैं आज़माइशें कैसा ये इम्तिहान है
मेरे जुनूँ के वास्ते हिज्र की एक रात बस

वो है जमाल-ए-बेकराँ क़ैदी-ए-रंग है नज़र
दीदा-ए-शौक़ देख ले आईना-ए-सिफ़ात बस

सारे जहाँ की तोहमतें लग चुकीं हम पे शहर में
दीजे न अब सफ़ाइयाँ कीजे न हम से बात बस

हूर-ओ-क़ुसूर-ओ-मय सभी अहल-ए-सफ़ा के वास्ते
मुजरिम-ए-इश्क़ के लिए वा'दा-ए-यक-नजात बस