मेरे गुल का जो कोई लुत्फ़-ओ-करम देखा है
हुस्न और ख़ल्क़ के तईं उस ने बहम देखा है
तेरे अबरू के मुक़ाबिल तो हिलाल-आसा है
हर कमाँ-अबरू की क़ामत को भी ख़म देखा है
चश्म-ए-अल्ताफ़ से उस मस्त नयन की है कमाँ
कि किसी वक़्त मिरे दीदा-ए-नम देखा है
कहते हैं दार-ए-मेहन है ये जहान-ए-फ़ानी
कौन वो शख़्स है जिन ने कि न ग़म देखा है
अश्क और आह से है 'इश्क़' का रौशन एजाज़
आब ओ आतिश को किसू ने भी बहम देखा है
ग़ज़ल
मेरे गुल का जो कोई लुत्फ़-ओ-करम देखा है
इश्क़ औरंगाबादी

