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मेहर-ओ-उल्फ़त से मआल-ए-तहज़ीब | शाही शायरी
mehr-o-ulfat se maal-e-tahzib

ग़ज़ल

मेहर-ओ-उल्फ़त से मआल-ए-तहज़ीब

हबीब मूसवी

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मेहर-ओ-उल्फ़त से मआल-ए-तहज़ीब
ख़ाकसारी है कमाल-ए-तहज़ीब

है वो आराइश-ए-हुस्न-ए-बातिन
जिस को कहते हैं जमाल-ए-तहज़ीब

कम नहीं मर्दुमक-ए-चश्म से कुछ
रुख़-ए-इंसान पे ख़ाल-ए-तहज़ीब

आज-कल हम में अगर सच पूछो
शक्ल अन्क़ा है मिसाल-ए-तहज़ीब

कभी होता नहीं बद-वज़अ' का ख़ौफ़
है अजब जाह-ओ-जलाल-ए-तहज़ीब

रुख़ पे करता है मतानत पैदा
दिल में आते ही ख़याल-ए-तहज़ीब

अपने मतलब का जहाँ कुछ हो लगाव
नहीं रहता है ख़याल-ए-तहज़ीब

क़ौम का अपने न घटता वो उरूज
हो न जाता जो ज़वाल-ए-तहज़ीब

जाम-ए-जम से है कहीं पुर-तम्कीं
बज़्म-ए-ख़ुल्लत में सिफ़ाल-ए-तहज़ीब

उस का ख़ूँ करते हैं जो नाहक़-कोश
उन की गर्दन पे वबाल-ए-तहज़ीब

मुर्दा क़ौमों के लिए आब-ए-हयात
बनता जाता है ज़ुलाल-ए-तहज़ीब

बद्र बन जाएगा चंदे में 'हबीब'
हक़ ने चाहा तो हिलाल-ए-तहज़ीब